हुए तुमको शिकवे हमसे, औ' कुछ गिले हुए,
औ' इक उमर गुज़री अपनी, तुमसे मिले हुए.
ना बोल पाए हम कुछ, यूँ रहके भी बा-वफ़ा,
गुज़रे बाज़ार-ए-इश्क से, हम लब सिले हुए.
क्या वक़्त सम्भालेगा, उस आशियाँ को अब,
दरार जिसकी दीवारों में, और बुर्ज हिले हुए.
खुशियों का नाम हमको, अब रहता नहीं याद,
गम-ए-आशिकी से अपने, यूँ सिलसिले हुए.
मुफ़्लिस मैं ज़माने में, जो लुट गया तो क्या,
गिरे हैं शाहों के तख़्त भी, औ' वीराँ क़िले हुए.
थी क्या बिसात 'आदि', जो जिंदा रहते हम,
जब वो बाग़बान ही कुचले, यूँ गुल खिले हुए.
औ' इक उमर गुज़री अपनी, तुमसे मिले हुए.
ना बोल पाए हम कुछ, यूँ रहके भी बा-वफ़ा,
गुज़रे बाज़ार-ए-इश्क से, हम लब सिले हुए.
क्या वक़्त सम्भालेगा, उस आशियाँ को अब,
दरार जिसकी दीवारों में, और बुर्ज हिले हुए.
खुशियों का नाम हमको, अब रहता नहीं याद,
गम-ए-आशिकी से अपने, यूँ सिलसिले हुए.
मुफ़्लिस मैं ज़माने में, जो लुट गया तो क्या,
गिरे हैं शाहों के तख़्त भी, औ' वीराँ क़िले हुए.
थी क्या बिसात 'आदि', जो जिंदा रहते हम,
जब वो बाग़बान ही कुचले, यूँ गुल खिले हुए.
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