कलेजा चीर गया, बस इक नज़र करके,
होश छीन ले गया, मय सा असर करके।
आरजू भी उसकी, शिकवा भी है उसी से,
कहाँ खो गया है वो, मेरा ये हशर करके।
किसी काम का न रहेगा, ये मकाँ-ए-दिल,
छोड़ नशेमन न जा, कुछ दिन बसर करके।
तब से ही अब्र से, तोड़ दिया नाता हमने,
जब से तू गुज़रा है, काँधे पे चुनर करके।
मेरा होना गर तुझे, खल रहा है बज़्म में,
तो चलता हूँ तेरे हवाले, जाँ-जिगर करके।
क्यूँ इस कदर हावी है, बस तमन्ना तेरी,
रो रहा हूँ खुद को मैं, आशुफ्ता-सर करके।
छोड़ ना 'आदि', सोचना क्या ज़िन्दगी पे,
क्या पायेगा उसके बिना, यूँ फिकर करके।
[ Aashuftaa-sar - Mentally Deranged ]
Superb writing adi!!
ReplyDeleteJab likhte ho kaleja cher deta ho..bahot khoob ghazal hui hai.
Woowwww!!
achi gazal hai..u aap hamesha hi acha likhte hai
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