बिस्तर की सिलवटों ने, ये पैगाम लिख दिया,
ता-शब चली जद्दोजहद, इश्क नाम लिख दिया.
तब होश भी जाता रहा और, चैन भी आता रहा,
जब यार ने मेरे लबों पे, अपना नाम लिख दिया.
दिल ये तड़पा बहुत था और, जागे थे अरमाँ सभी,
जब उसने हसरतों को, सर-ए-शाम लिख दिया.
हमने पूछा कुछ पता तो, दे दो दर-ए-सुकून का,
उसने अपनी जुल्फों का, साया तमाम लिख दिया.
जब खुदा से पूछा मैंने, क्या है अब किस्मत मेरी,
उसने भी उनकी मोहब्बत, सर अंजाम लिख दिया.
होश की बेहोशी पर ना, आया उनको कुछ रहम,
बस यू तड़पना ही मेरा, अय्याम लिख दिया.
जीना भी सीखा हूँ मैं बस, जबसे पाया है उन्हें,
दिल ने उनके फज़ल का, एहतराम लिख दिया.
ता-शब चली जद्दोजहद, इश्क नाम लिख दिया.
तब होश भी जाता रहा और, चैन भी आता रहा,
जब यार ने मेरे लबों पे, अपना नाम लिख दिया.
दिल ये तड़पा बहुत था और, जागे थे अरमाँ सभी,
जब उसने हसरतों को, सर-ए-शाम लिख दिया.
हमने पूछा कुछ पता तो, दे दो दर-ए-सुकून का,
उसने अपनी जुल्फों का, साया तमाम लिख दिया.
जब खुदा से पूछा मैंने, क्या है अब किस्मत मेरी,
उसने भी उनकी मोहब्बत, सर अंजाम लिख दिया.
होश की बेहोशी पर ना, आया उनको कुछ रहम,
बस यू तड़पना ही मेरा, अय्याम लिख दिया.
जीना भी सीखा हूँ मैं बस, जबसे पाया है उन्हें,
दिल ने उनके फज़ल का, एहतराम लिख दिया.
आप तो बहुत अच्छी गज़ल लिखते हैं बधाई।
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