बस एक खनक की चाहत में, मैं खुद को साज़ बना बैठा,
खुद ही ना जिसको समझा मैं, खुद को वो राज़ बना बैठा.
ज़मीन पे गिरके तड़पा भी पर, हासिल कुछ ना हाथ लगा,
जिसने पर मेरे छीन लिए, मैं वो परवाज़ बना बैठा.
लोग तो मुझसे कहते थे पर, जाहिल मैं ही था शायद,
जो खुद ही अपने कातिल को, अपना सरताज बना बैठा.
क्या मुझे इल्म था हस्ती मेरी, मेरे अपने लूटेंगे,
राज़ कहाँ अब राज़ रहे जो, उनको हमराज़ बना बैठा.
कौन सुनेगा मेरी अब और, कौन करेगा मुझ पे यकीन,
जिसकी खातिर था जुर्म किया, उसको आवाज़ बना बैठा.
क्यूँ चुभन सी होती है मुझको, खुद अपने ही अरमानो में,
जो था कांटो से भरा हुआ, मैं उसको ताज बना बैठा.
मौत ही मंजिल जिसकी है और, चलना भी जिसपे ज़रूरी है,
मैं खुद ही अपने हाथो से, वो राहें आज बना बैठा.
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