
माना तेरी निगाह का, मंज़र नहीं हैं हम,
गम ही मकाँ सही पर, बेघर नहीं हैं हम.
तेरे इकरार पे खिले थे, मुश्क-ए-आरज़ू,
इनको रोक पाते कैसे, बंजर नहीं हैं हम.
थोड़ी रौशनी पाके, हम भी संवर जायेंगे,
दयार-ए-वफ़ा हैं कि, खंडहर नहीं हैं हम.
साहिल बिखर गए हैं, सैलाब'ए-हिज्र में,
अदना सा दरिया हैं, समंदर नहीं हैं हम.
दिल्लगी छोड़ो, बताओ सूरत'ए-इकरार,
ग़ज़लें लिखें कब तक, शायर नहीं हैं हम.
इक तो जुदाई तेरी, उसपे यादें ये बेरहम,
यूँ फूटके, रोते वरना, अक्सर नहीं हैं हम.
आदि' संभाल लेते, शर्त'ए-शय'ओ-मात,
पर गुलाम-ए-वक़्त, सिकंदर नहीं हैं हम.
[ Manzar : Scene ] [ Maqaan : Residence ]
[ Iqraar : Declaration ] [ Mushq : Flower ]
[ Dayar : Residence ] [ Saahil : Shore ]
[ Sailaab : Flood ] [ Hijra : Separation ]
[ Surat-e-Iqraar : Condition for Declaration ]
[ Shart-e-Shay-o-Maat : Conditions of Victory and Defeat ]