Sunday, December 20, 2009

ज़माने वाले ...

मोहब्बत को मजाक़ समझते हैं ज़माने वाले,
फिर मुझे क्या खाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मैं तो बस उल्फत की पैरवी में रहता हूँ यारों,
मेरे अंदाज़ को बेबाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

खुद में पैवस्त किया है उसको इश्क के चलते,
क्यूँ मुझे गिरेबाँ चाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

इन अदाओं से ही जीती बाज़ी-ए-इश्क उसने,
फिर क्यूँ उसे चालाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

हमें तो जीने की अदा सिखा गया इश्क उनका,
नादाँ हैं जो हमें हलाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मेरी सांस को नव्ज़ों के खूँ को रवानी दी उसने,
तो क्यूँ उसे ख़तरनाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

उनके ही सजदे करते हैं फक्त इक दीद के लिए,
हमारी तरह उन्हें पाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

कि उनकी रुसवाई के डर से दूर हुआ है 'आदि',
ज़ब्त-ए-गम-ए-फ़िराक़ समझते हैं ज़माने वाले.

Tuesday, December 8, 2009

बदलना सबको पड़ता है...

मुसीबत सब पे आती है, लड़ना सब को पड़ता है,
कदम थकते हैं सब ही के, चलना सब को पड़ता है.

हमेशा ही जीत हो हासिल, ज़रूरी ये नही होता,
कभी हार कर ख़ुद को, संभलना सब को पड़ता है.

बसर करती हैं गुलशन में, खिज़ाएँ भी बहारें भी,
हँसीं होता है गुल लेकिन, बिखरना सब को पड़ता है.

थोड़ा मैं संभल जाऊं, ज़रा तुम भी संभल जाओ,
जहाँ में दौर-ए-फुरक़त से, गुज़रना सबको पड़ता है.

कभी खुशियाँ मिलती हैं, कभी गम भी बरसते हैं,
ये दो साँचे हैं जीवन के, ढलना सब को पड़ता है.

ना खोना होश तू अपने, जो बिछड़े कोई भी अपना,
बिसात-ए-उल्फतें हैं ये, बहलना सब को पड़ता है.

ये अकेला मैं नहीं कहता, तुझे भी इल्म ये होगा,
गुज़रते वक्त के संग संग, बदलना सब को पड़ता है.

थपेड़े 'आदि' सहने हैं, जो कश्ती डाली दरिया में,
बहर-ए-ज़ीस्त गहरा है, निकलना सब को पड़ता है.




[ Bahar-e-Zeest - The Sea Of Life ]

Sunday, November 29, 2009

उधार की सांस ...

इक उधार की सांस लिए,
मन में चुभी इक फांस लिए,
चलता हूँ फिर उन गलियों में,
तुमसे मिलने की आस लिए.

कोई मिला ना मोड़ों पर,
छान ली सारी राख प्रिये,
अकेलापन और चाहत थी,
और एक था मैं वनवास लिए.

है याद मुझे वो हर इक क्षण,
जो हमने साथ बिताया था,
चूनर काँधों पे डाले हुए,
तुम आती थी मधुमास लिए.

वो प्रेम प्रतिज्ञा तोड़ तो दूँ,
पर तुमको कैसे त्यागूँ मैं,
स्वयं को कैसे झुठला दूँ,
मन में तेरा विश्वास लिए.

ये आस का पंछी चाहता है,
तोड़ दे पिंजरा दुनिया का,
पर तुम भी कुछ असहाय सी हो,
और मैं भी हूँ अवसाद लिए.

कौन हूँ मैं ना जानता हूँ,
जबसे मैं दूर हुआ तुमसे,
हर ख़ुशी भी रूठी है मुझसे,
है जीवन भी प्रवास लिए.

Wednesday, November 25, 2009

फ़ना हुए जाते हैं ...

हिजाब-ए-शौक़ में फ़ना हुए जाते हैं,
तेरी दीद पे सौ अफ़साने बने जाते हैं.

नशे में अब तलक है ये अयाम मेरा,
ताशब जो तेरी नज़र से पिए जाते हैं.

किस से मकान-ए-यार का पता पूछूं,
ये चिराग तेरी साँसों से बुझे जाते हैं.

कश्ती का हश्र बावस्ता तूफाँ से भी है,
साहिल को क्यूँ इल्ज़ाम दिए जाते हैं.

रंग औ' नूर से अपनी पहचान भी थी,
तो क्यूँ हर्फ़ औ' खूँ स्याह हुए जाते हैं.

गुलों की हसरत में कांटे न भुला देना,
आबरू बचाने इनके पर्दे किए जाते हैं.

मुझे भुला दे ये भी कहते हैं तेरे अपने,
औ' तेरे सामने मेरा नाम लिए जाते हैं.

इल्तजा है इक नज़र 'आदि' पे कर दे,
इसी ख्वाहिश में अब तक जिए जाते हैं.