Saturday, June 19, 2010

मेरी तन्हाई ...

शब बसर होती है लेकिन, मेरी तन्हाई नहीं,
रु-ब-रु आ कि तूने, मेरी चाह आजमाई नहीं.

इन मेरी आँखों से, मेरा खून जब बहा न हो,
इश्क के बाद ऐसी ज़िंदगी, अभी बिताई नहीं.

ज़माने से कहा कि उसने कुछ बताया न मुझे,
मौत से पहले क्या, दास्तान मैंने सुनाई नहीं.

मैं मगर खुश हूँ अब हिज्र-ए-इश्क में क्यूंकि,
हुआ है इल्म मेरा हासिल उनकी रानाई नहीं.

सिल लिए होंठ ये जब, बज़्म में आये थे तुम,
इश्क ब-इज्ज़त चाहिए, तुम्हारी रुस्वाई नहीं.

क़ीमत इश्क की लगाना ज़माने का हुनर होगा,
तिजारत ये होगी नहीं हमसे, हम सौदाई नहीं.

गुनाह-ए-इश्क में मंज़ूर है, सज़ा-ए-मौत हमें,
झुका दरबार में सिर 'आदि', देगा सफाई नहीं.

बख्शे हैं ...

दर कदम वक़्त ने सीरत पे ज़खम बख्शे हैं,
ज़मीं-ए-ख़ार मुझको, उनको हरम बख्शे हैं.

मेरी नज़रों से, टपकता है, इश्क हर लम्हा,
दिवार-ए-दिल पे स्याह धब्बे, नम बख्शे हैं.

हम-शबिस्ताँ हैं आजकल, महज़ यादें तेरी,
मेरे ख़्वाबों ने मुझे, वस्ल के भरम बख्शे हैं.

कोई न कुछ मांगेगा यारों से अब ज़माने में,
मेरी ख्वाहिश पे मुझे उसने यूँ गम बख्शे हैं.

हो क्या सैयाद से शिकवा औ गिला तीरों से,
जब बागबाँ ने ही, साँसों पर ज़ुलम बख्शे हैं.

न जिन्हें आहों की परवाह, न फिक्र दर्दों की,
वाह ख़ुदा तूने क्या संगदिल सनम बख्शे हैं.

तेरी गलियों में बस इक सदा ही देगा आदि',
मेरी साँसों ने, लम्हात-ए-सब्र कम बख्शे हैं.

तेरी राहों में चले ...

मुन्तज़िर इश्क के बनके, तेरी राहों में चले,
बावस्ता तुझसे होके ख्वाब, निगाहों में चले.

साँसे, आबशार-ए-दर्द में, अब तक थी रवाँ,
ढूंढने मकाँ-ए-सुकूँ हम, तेरी पनाहों में चले.

बला से हुस्न की मलिका हो, शोखियाँ थामे,
सौ फ़साने तुझे देख कर, मेरी आहों में चले.

अब बस, इक दुआ करता हूँ, खुदा से जाना,
मेरी हर सांस, मेरा वक़्त, तेरी बाहों में चले.

तुमने जबसे, इन आँखों से है इकरार किया,
हम भी, हो के शुमार, इश्क के शाहों में चले.

तेरी इक दीद पे सारे पीर, खुदा के हुए हैं उदु,
छोड़ मस्जिद की डगर, राह-ए-चाहों में चले.

नश्तर सी नज़र वाले, आ क़त्ल कर दे मुझे,
ख़ुशी ख़ुशी हम आज तेरी क़त्लगाहों में चले.

बार-ए-इश्क में, ना तेरा गुनाह साबित होगा,
सब अलम सर ले संग 'आदि' गवाहों में चले.

तुमको शिकवे हमसे ...

हुए तुमको शिकवे हमसे, औ' कुछ गिले हुए,
औ' इक उमर गुज़री अपनी, तुमसे मिले हुए.

ना बोल पाए हम कुछ, यूँ रहके भी बा-वफ़ा,
गुज़रे बाज़ार-ए-इश्क से, हम लब सिले हुए.

क्या वक़्त सम्भालेगा, उस आशियाँ को अब,
दरार जिसकी दीवारों में, और बुर्ज हिले हुए.

खुशियों का नाम हमको, अब रहता नहीं याद,
गम-ए-आशिकी से अपने, यूँ सिलसिले हुए.

मुफ़्लिस मैं ज़माने में, जो लुट गया तो क्या,
गिरे हैं शाहों के तख़्त भी, औ' वीराँ क़िले हुए.

थी क्या बिसात 'आदि', जो जिंदा रहते हम,
जब वो बाग़बान ही कुचले, यूँ गुल खिले हुए.