Saturday, July 25, 2009

बस एक खनक की चाहत में, मैं खुद को साज़ बना बैठा,
खुद ही ना जिसको समझा मैं, खुद को वो राज़ बना बैठा.

ज़मीन पे गिरके तड़पा भी पर, हासिल कुछ ना हाथ लगा,
जिसने पर मेरे छीन लिए, मैं वो परवाज़ बना बैठा.

लोग तो मुझसे कहते थे पर, जाहिल मैं ही था शायद,
जो खुद ही अपने कातिल को, अपना सरताज बना बैठा.

क्या मुझे इल्म था हस्ती मेरी, मेरे अपने लूटेंगे,
राज़ कहाँ अब राज़ रहे जो, उनको हमराज़ बना बैठा.

कौन सुनेगा मेरी अब और, कौन करेगा मुझ पे यकीन,
जिसकी खातिर था जुर्म किया, उसको आवाज़ बना बैठा.

क्यूँ चुभन सी होती है मुझको, खुद अपने ही अरमानो में,
जो था कांटो से भरा हुआ, मैं उसको ताज बना बैठा.

मौत ही मंजिल जिसकी है और, चलना भी जिसपे ज़रूरी है,
मैं खुद ही अपने हाथो से, वो राहें आज बना बैठा.
देख तिजारत चाहत की, सांस थमी है यारी की.
कैसे समझाऊ तुझको, क्या हालत है दिलदारी की.

आज बाज़ार-ए-इश्क लगा है, कितने खरीदार आये हैं,
ऐसे आलम में अब दिल में, जगह कहाँ खुद्दारी की.

जब तक मेरे पास था वो, हर शय पे मेरा राज रहा,
अब मुफलिस सा पर भटक रहा हूँ, संगत है बेकारी की.

ना चैन से जीने देती है, ना जान ही मेरी लेती है,
तू ही बता दे मुझको बशर, क्या अदा है ये बीमारी की.

उनके नशे में आलम अपना, खुद ही बेगाना कर बैठा,
अब डरता हूँ अपनों से भी, और चाहत नहीं खुमारी की.

नज़र परेशाँ धड़कन हैराँ, लहू रगों का तड़पा है,
दौड़ता हूँ सायों के पीछे, ये हालत है बेजारी की.

गर सोने दे मुझको वो तो, ज़मीन के नीचे सो जाऊं,
कि अब ना साँसे कटती हैं, बेहया सी इस इंतज़ारी की.

Sunday, January 11, 2009

तेरे रुखसार की कीमत, चुकाऊंगा सनम मैं फिर,
मोहब्बत में तेरी ये सर, झुकाउंगा सनम मैं फिर।

कैसी
की शरारत तूने, मेरे दिल से पिछली रात,
भरी महफिल में यारो को, बताऊंगा सनम मैं फिर।

मैंने जब वार दी खुशियाँ, सभी तेरी मोहब्बत पे,
तो क्यूँ उन खुशियों पे अब हक, जताऊंगा सनम मैं फिर।

ये मेरा ज़ख्म-ए-दिल है आखिरी, बस दीद तू कर ले,
तेरी चौखट पे आइन्दा, ना आऊंगा सनम मैं फिर।

मेरी रुसवाई देती है, तुझे अब वास्ता सुन ले,
ना मेरी इल्तेज़ा तुझको,
सुनाऊंगा सनम मैं फिर।

पशेमान ना रहे तू भी, गिला मुझको भी ना फिर हो,
चला जाऊंगा ना तुझको, रुलाऊंगा सनम मैं फिर।

Saturday, January 10, 2009

मोहब्बत ...

कुछ इस कदर हावी, मोहब्बत है जवानी में,
गुमान होता है जैसे अब, लगी है आग पानी में।

बड़ी नज़दीकियाँ देखी हैं, हमने ज़ीस्त से गम की,
ज़रा सी पाई हैं खुशियाँ, मोहब्बत की कहानी में।

कभी हमने अजानें की थी, पाने की खुदा को पर,
मिले जबसे हैं उनसे हम, मज़ा है बे-ज़ुबानी में।

मेरे दिल के सफीने पर, नज़र अब आई सागर की,
बड़ी खुश ज़िन्दगी है अब, मज़ा है अब रवानी में।

बड़े नाजो से पाला है, ये शौक-ए-इश्क अब मैंने,
गुमां सब चूर अब होते हैं, उनकी मेहरबानी में।

भला क्यूँ इस कदर हैरां, ज़माना है मेरी साँसों पे,
मुझे तो जिंदगी दिखती है, उनकी हर निशानी में।

जो जलवे मैंने देखे हैं, खुदा भी देख ना पाया,
ना शरारे उन अदाओं के हैं, आब-ए-आसमानी
में।

मेरी तन्हाइयां लेकर, मुझे वो कर गए अपना,
महज़ वो चाहिए मुझको, मेरी इस जिंदगानी
में।



(Zeest - Life)
(Safeena - Boat)