Monday, December 29, 2008

एक सवाल ...

दिल की गली में या खुदा, ये मकाम कैसा है,
रगों का खून भी जिसे, पढता है नाम कैसा है.

लोग तो कहते हैं इश्क, जिंदगी देता है मगर,
मैं मिटा क्यूँ हूँ खुदा, ये अंजाम कैसा है.

हर तरफ़ नूर है खुशबु है, उनके हर पल में,
मेरा गुलशन ही क्यूँ वीरान है, आयाम कैसा है.

उनके ही सजदे किए हैं, उनसे ही की है दुआ,
ना जानू मैं क्या करू, खुदा का नाम कैसा है.

लूट कर ख़ुद ही गया है, वो मेरी दुनिया बशर,
खुदा जाने वो मेरे दिल का, जालिम निजाम कैसा है.

उन्हीं को देख के जीना, उन्ही से शिकवे करू,
देख तो आके खुदा उनका, ये गुलाम कैसा है.

दिल देके हमने महज़, दर्द-ओ-गम कमाया है,
मेरी उल्फत का मिला उफ्फ्फ, ये इनाम कैसा है.

जब तलक जीता रहा मैं, उन्ही की ख्वाहिश थी,
देखू तो सही कब्र में ख्वाबो का, इन्तेजाम कैसा है.





(Nizaam-Administrator)
(Ayaam-Day)
(Intezaam-Arrangement)

इल्तेजा ...

मेरी बेताबी को दिलबर, न बढ़ाया कीजे,
रात छत पे जो मैं आऊ, आप आया कीजे।

चार लम्हों की फ़क्त जागीर है, ये जिंदगी मेरी,
रूठकर इसपे सितम यू तो, न ढाया कीजे।

जब भी दिल आए हमारा, तुम्हारी शोखी पर,
रस्म-ए-उल्फत की अदा, आप भी निभाया कीजे।

चार दिन की जिंदगी में, चार पल हैं इश्क के,
इन पालो की आरजू को, यू न ज़ाया कीजे।

जब तलक न दीद होगी चैन आएगा नहीं,
ख्वाबो में आ जाइये, यू न सताया कीजे।

बहुत दीवाने हैं आपके, रुखसार के लेकिन,
हम भी तो आशिक हैं, यू न भुलाया कीजे।

Saturday, December 27, 2008

कुछ खफा खफा सा...

कुछ खफा-खफा सा, आज यार है मेरा,
कोने मैं रोता हुआ खुदा, प्यार है मेरा।

इन हसरतों की अब, बातें न करो लोगो,
इन्ही की बदौलत दिल, बेजार है मेरा।

लाख बेदर्द सही पर, कोई बात नहीं,
जैसा भी है वो बस, दिलदार है मेरा।

इन लम्हों से भला यूँ, क्या शिकायत करनी,
वो क्या करें की बस, ये इंतज़ार है मेरा।

वो जफा भी करें, तो भी मंज़ूर मुझे,
मैं उल्फत में रहूँगा, इकरार है मेरा।

देख के उठा लेते हैं, वो ख़ंज़र लेकिन,
उनका दिल भी तो खुदा, गुनहगार है मेरा।

Tuesday, December 23, 2008

आरजू ...

हर घडी दिल में वफ़ा की, इक शमा जलती रही,
आरजू मिलने की तुझसे, दिन-ब-दिन पलती रही।

बस तड़पते हम रहे, हर रोज़ तेरी याद में,
उम्र भी गुजरी यू ही, और शाम भी ढलती रही।

यू तो था सारा जहाँ, मेरी नज़र के सामने,
एक तू ही ना दिखा, ये बात बस खलती रही।

महफिलों में नज़्म थी, साकी भी था और जाम भी,
फिर भी तेरे हुस्न की ही, बात बस चलती रही।

ज़र्रा होके की तमन्ना, मैंने पाने की चाँद को,
था बड़ा नादान मैं या, ये मेरी गलती रही।