Saturday, December 20, 2008

बेकरारी ...

मेरे इस नादान दिल की, बेकरारी देखिये,
मर मिटा है उनपे इसकी, करगुजारी देखिये।

दीद जबसे हुई सनम की, तबसे कुछ बहका सा है,
किस कदर छाई है, इस दिल पे खुमारी देखिये।

पत्थरो को भी चीर दे फिर, क्या बिसात-ए-दिल मेरी,
हो नहीं सकती नज़र ये, है ये आरी देखिये।

उनके दर की रहगुज़र में, हो गए कितने फन्ना,
या खुदा आई है अब के, मेरी बारी देखिये।

मरते दम की थी तमन्ना, हमने उनकी दीद की,
नाम में इतना असर था कि, मौत हारी देखिये।

देख के उनको सभी ने, शुरू कर दी बंदगी,
कैसे बनते हैं जहाँ में, अब पुजारी देखिये।

कत्ल होके उनकी नजरो से, बाज़ अब भी ना आये हम,
मौत के साए में कैसे है, इश्क जारी देखिये।

दिल मेरा है चमन सा और, वो लगे सैयाद है,
जिंदगी और मौत की ये, अजब यारी देखिये।

Sunday, December 14, 2008

वतन ..

मर चुके दिल की रगों में,खून जिंदा चाहिए,
हमको फिर अपने वतन में,सुकून जिंदा चाहिए।

तोड़ दो दीवारें सारी,ये जहाँ कर लो फतह,
आज हमको फिर वतन के,मफ्तून जिंदा चाहिए।

कह सके दुश्मन से जाके,खून की बातें सभी,
अब दिलो में बस वही,मजमून जिंदा चाहिए।

kaat
दे वो हाथ जो,उठ गया है शान पे,
अब वतन को मेरे वो,कानून जिंदा चाहिए।

मर मिटे इज्ज़त की खातिर,काट दे सब बेडियाँ,
वो भगत अशफाक सा फिर,जुनून जिंदा चाहिए।

कॉम हर जीती थी संग संग,जो कभी इस दहर में,
आज फिर इंसान को वो,तवज़ून जिंदा चाहिए।


[Maftoon = Mad in Love]
[Majmoon = Message written in a letter]
[Tavazoon = Balance]

Friday, December 12, 2008

नज़र की राहों से बहते...

नज़र की राहों से बहते,लफ्ज़ वो उनके रहे,
ख्वाब दिल जो बुन रहा था,ख्वाब वो उनके रहे।

छोड़ शाखों पे वो कलियाँ,चुन लिए कांटे खुदा,
आलम-ए-मदहोशी में हम,इस कदर उनके रहे।

मेरे बिस्तर पे मिलेगा,और कुछ क्या तुमको अब,
साथ जिनके रात भर था,ख्वाब वो उनके रहे।

खूशबू ने डेरा किया है,कैसे मेरे रूबरू.
गुज़रे हैं वो पास से या,अक्स वो उनके रहे।

लड़खडाए सिर्फ हम या,रिंद भी मदहोश हैं,
ये कसूर-ए-जाम है या,असर ये उनके रहे।

बहुत कोशिश की है मैंने,छूट जाऊ इश्क से,
दिल मगर जिस कैद में है,दस्त वो उनके रहे।


(दस्त = हाथ)

Thursday, November 6, 2008

सितम

हर सितम उल्फत का,उनके सामने बेनूर है,
टूटा हूँ तो क्या हुआ,मेरा नाम भी मशहूर है।

दिल पिघल कर आज बोला,बहने दे मुझको बशर,
ऐसे मर-मर के धड़कना,अब नहीं मंज़ूर है।

माना महताब-ए-फलक,दूर होता है बाम से,
रौशनी फिर भी है देता,वो नहीं मगरूर है।

संगदिल परदा-नशीं से,क्या करू उम्मीद-ए-रहम,
वो तो अपने हुस्न के,जलवों में ही कुछ चूर है।

सोज़-ए-दिल रह रह के मुझसे,कर रहा है इल्तेजा,
कब्र में सो जाने दे,वहां चैन भी भरपूर है।

खिज़ा आते ही ज्यूँ खुशबू,छोड़ देती है चमन,
मन भरे पे छोड़ देना,हुस्न का भी दस्तूर है।

इश्क हूँ मैं तेरी नज़र से,कैसे करू मुकाबला,
मैं हूँ गर्त-ए-गम-ओ-अँधेरा,तू चमकता नूर है।