Wednesday, March 9, 2011

किताब में सोया वो गुलाब ...


किताब में सोया वो गुलाब,
एक दिन ऊंघते हुए,
आँख खोलकर,
किताब के पन्नों से बोला,
वो शख्स कहाँ है..
जिसने मुझे ये पनाह बख्शी थी.???
पन्ना उसकी तरफ देख के मुस्कुराया,
और अपने ऊपर जमी,
वक़्त की धूल हटाते हुए,
कुछ देखकर,
फिर मुस्कुरा दिया।

गुलाब ने पूछा क्या हुआ..?
तब वो यादों के तहखाने से,
कुछ लम्हे अपनी आगोश में,
समेट कर बोला:
वो सर्दियों के दिन हुआ करते थे,
मैं एक स्कूल के बस्ते में,
अपना वजूद समेटे,
उसके साथ चला करता था,
अचानक एक दिन उसने मुझे,
किन्ही नरम मरमरी हाथों में देते हुए कहा:
आराम से पढ़ लो,
फिर वापस कर देना.

ना जाने पढने वाले ने क्या पढ़ा,
उसकी नज़रों में या मेरे पन्नों में,
कि उसने मुझे,
तेरी खुश्बू-ओ-रंग से नवाज़ दिया.
और जब में वापस अपने बस्ते में पहुंचा...

तो गर्मियों के दिन शुरू हो चुके थे,
मैं वापस लाइब्रेरी में आ गया.
और वो पनाह देने वाला,
ज़माने में कहीं खो गया.

मैंने भी बहुत ढूंढा और उसने भी..
पर वो नहीं मिला॥

आज वो तो तन्हा सा होगा ही,
और अब तक तुम भी तन्हा थे,
पर यादों के आँगन में लाके,
आज तुमने मुझे भी तन्हा कर दिया.

2 comments:

  1. Waah Dear Bro kya khub likha hai........
    gulab bhi tna soch sakta hai maine to kabhi socha bhi na tha .aapne to gulab ke man ki baaton ko sabdo me dhal diya .bahut khoob..

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  2. brilliant... i usually don't read poems.. but this one is really nice..

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