Monday, January 11, 2010

आरज़ू हो जाऊँ मैं तेरी ...

यार से शिकवा हो कैसा, खुद से शिकायत है हमको,
जान से भी प्यारी यारो, उनकी ये नज़ाक़त है हमको.

वो सुर्ख नज़र वो अंगड़ाई, उस पर वो लब अंगारों से,
इक दीद की कीमत ऐसी क्या, आई हरारत है हमको.

खुद बहका सा फिरता है जो, पीके उनकी ही नज़रों से,
बज़्म में आके आज वही, सिखलाए शराफत है हमको.

कौन मरा है किसकी ख़ातिर, कब्र की ताबिश से पूछो,
उस क़ातिल का नाम न लें हम, ऐसी हिदायत है हमको.

अए मेरे तसव्वुर जाग ज़रा, खूँ को ए कलम रवानी दे,
वो पढ़के समायें बाहों में, लिखनी वो इबारत है हमको.

नज़र से यूँ होके गुजरूँ कि, करलूँ ठिकाना दिल में ही,
आरज़ू हो जाऊँ मैं तेरी, क्या इतनी इजाज़त है हमको.

ए ख़ुदा अगर कर पाए तो, 'आदि' पे एहसाँ इतना कर,
महबूब ख़ुदा हो जाए उसी की, करनी इबादत है हमको.

No comments:

Post a Comment