Sunday, November 29, 2009

उधार की सांस ...

इक उधार की सांस लिए,
मन में चुभी इक फांस लिए,
चलता हूँ फिर उन गलियों में,
तुमसे मिलने की आस लिए.

कोई मिला ना मोड़ों पर,
छान ली सारी राख प्रिये,
अकेलापन और चाहत थी,
और एक था मैं वनवास लिए.

है याद मुझे वो हर इक क्षण,
जो हमने साथ बिताया था,
चूनर काँधों पे डाले हुए,
तुम आती थी मधुमास लिए.

वो प्रेम प्रतिज्ञा तोड़ तो दूँ,
पर तुमको कैसे त्यागूँ मैं,
स्वयं को कैसे झुठला दूँ,
मन में तेरा विश्वास लिए.

ये आस का पंछी चाहता है,
तोड़ दे पिंजरा दुनिया का,
पर तुम भी कुछ असहाय सी हो,
और मैं भी हूँ अवसाद लिए.

कौन हूँ मैं ना जानता हूँ,
जबसे मैं दूर हुआ तुमसे,
हर ख़ुशी भी रूठी है मुझसे,
है जीवन भी प्रवास लिए.

1 comment:

  1. Bahut jabardast likha hai bhai....one of best from your pen...ghazal ke badshah to aap hain hi ab kavita ke bhi raja hote ja rahe ho.

    keep writing.

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