Monday, September 21, 2009

चले कहाँ तुम महफिल से ...

हुस्न क़यामत सा लेके ये, चले कहाँ तुम महफिल से,
कुछ देर खुदाया रुक जाओ, अरमान हुए हैं गाफिल से।

देखा है क्या तुमने किसी को, दुआ मौत की करते हुए,
खन्जर देके हाथ में उनके, करते हैं गुजारिश कातिल से।

अपनी कचहरी चौखट तेरी, जुल्फें तेरी अपनी सज़ा,
हमको शिकायत कोई नहीं, मिलें भला क्यूँ आदिल से।

कोई तो सहारा दे दो ज़रा, कोई तो घर तक पहुँचा दो,
जबसे नज़र में आये हैं वो, बन बैठे हम बिस्मिल से।

अब हाल मरीजों वाला है, ना कोई दवा ना दुआ लगे,
क्यूँ ऐसे हाल में छोड़ गए हैं, पूछे कोई उस संगदिल से।

कैसे मनाऊं अब मैं खुदा को, कैसे दुनिया को समझाऊं,
रीत-रिवाज ये तालीमों के, क्यूँ पूछते हो मुझ जाहिल से।

गर साथ यूँ ही तुम चलते रहो, सफ़र ख़तम ना होने दूँ,
हम-राह रहोगे सनम मेरे, क्या करना मुझको मंजिल से।

डर क्या होगा मौजों का और, तूफानों से खतरा क्या,
'
आदि' की कश्ती ही लगी है, तेरी बाहों के साहिल से

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