Sunday, July 26, 2009

बड़े अरमान से ये कमरा, संवारा है मैंने,
दिल जिसे कहते हैं, उल्फत में निखारा है मैंने

मेरे होश में आने का ना, इंतज़ार करना यारो,
जाम--मोहब्बत को, सीने में उतारा है मैंने

उम्मीद है कि उनका भी, जवाब आएगा,
बड़ी शिद्दत से मेरी जान, पुकारा है मैंने

हजारों दाग दिल में थे, हजारों ऐब भी देखे,
बड़ी मुश्किल से अब, दिल को सुधारा है मैंने

नज़र में आशियाँ तेरा, रगों में तू रवाँ है बस,
तुझ बिन जी ना पाएंगे, किया इशारा है मैंने

तुम्हारे बिन नहीं है कुछ ,कि ये बस जानता हूँ मैं,
कि जुदा होके इस वक़्त को, बस गुज़ारा है मैंने

मुझे बस जुस्तजू तेरी, सहारा भी एक तेरा है,
कि बाकी चाहतों को, सीने में ही मारा है मैंने

2 comments:

  1. bade hi manjhe tareeke ki shayri hai...achchha likha hai aapne sabhi sher achchhe lage...bahut-bahut khoob.

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  2. बहुत ही उम्दा गज़ल है।बधाई स्वीकारें।

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