Monday, January 5, 2009

जज़्बात ...

लड़ रहा है मुझसे जो, मेरा ही जज़्बात है,
चाहता हूँ हारना फिर, क्यूँ ये एहतियात है.

एक तनहा मैं नही हूँ, आज यारो बज्म में,
है अँधेरा रात भी है, और ये बरसात है.

चाहती हैं अर्ज़ करना, नज़रें लेकिन जाने क्यूँ,
रोकती है रूह जिसको, कौन सी ये बात है.

देखती है किसको मुड के, कदम यूँ पीछे किए,
बेवफा जो मुझसे हुई है, बस मेरी ही हयात है.

ऐ ज़माने ढूंढ़ ले जो, सानी हो इस हुस्न का,
इक तरफ़ मेरा सनम है,इक तरफ़ कायनात है.

मरते रहना दम-ब-दम यूँ, यादों के हाथों खुदा,
जिंदगी खैरात है ये, या की इक सौगात है.

इन्तेहा है ये तड़पने की, या है कुछ बाकी अभी,
अंजाम-ए-उल्फत है खुदा, या ये मौत की शुरुआत है.






(Ehtiyaat - Caution), (Bazm - Gathering or Mehfil)
(Hayaat - Life), (Saani - Competitor)
(Kaaynaat - Universe), (Khairaat - Charity)
(Saugaat - Prize or Reward), (Inteha - Extreme,Limit)

1 comment:

  1. क्या लिखा है आदित्य भाई

    कमाल कर दिया इस बार तो तुमने
    अब तक की सब से बेहतरीन गज़ल कहना चाहूँगा इसको मैं

    कमाल कर रहे हो॥

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