Monday, December 29, 2008

एक सवाल ...

दिल की गली में या खुदा, ये मकाम कैसा है,
रगों का खून भी जिसे, पढता है नाम कैसा है.

लोग तो कहते हैं इश्क, जिंदगी देता है मगर,
मैं मिटा क्यूँ हूँ खुदा, ये अंजाम कैसा है.

हर तरफ़ नूर है खुशबु है, उनके हर पल में,
मेरा गुलशन ही क्यूँ वीरान है, आयाम कैसा है.

उनके ही सजदे किए हैं, उनसे ही की है दुआ,
ना जानू मैं क्या करू, खुदा का नाम कैसा है.

लूट कर ख़ुद ही गया है, वो मेरी दुनिया बशर,
खुदा जाने वो मेरे दिल का, जालिम निजाम कैसा है.

उन्हीं को देख के जीना, उन्ही से शिकवे करू,
देख तो आके खुदा उनका, ये गुलाम कैसा है.

दिल देके हमने महज़, दर्द--गम कमाया है,
मेरी उल्फत का मिला उफ्फ्फ, ये इनाम कैसा है.

जब तलक जीता रहा मैं, उन्ही की ख्वाहिश थी,
देखू तो सही कब्र में ख्वाबो का, इन्तेजाम कैसा है.





(Nizaam-Administrator)
(Ayaam-Day)
(Intezaam-Arrangement)

2 comments:

  1. wow Aditya, Boss kamaal kar diya.

    AAkhiri sher to samjho maar hi dala...

    Bas 1-2 spelling mistakes thi...

    खुशबु -- गलत
    खुशबू -- सही

    इन्तज़ाम -- सही
    इन्तेजाम -- गलत

    बाकी आपकी पूरी गज़ल कातिलाना थी…

    meraa blog bhi padhiyegaa

    http://tanhaaiyan.blogspot.com

    Aur aapka layout bahut mast hai....
    kya naam hai layout ka...mujhe bhi batao....i also wanna try this out...

    ReplyDelete
  2. बहुत बढिया गज़ल है बधाई।

    ReplyDelete