Thursday, November 6, 2008

सितम

हर सितम उल्फत का,उनके सामने बेनूर है,
टूटा हूँ तो क्या हुआ,मेरा नाम भी मशहूर है

दिल पिघल कर आज बोला,बहने दे मुझको बशर,
ऐसे मर-मर के धड़कना,अब नहीं मंज़ूर है

माना महताब--फलक,दूर होता है बाम से,
रौशनी फिर भी है देता,वो नहीं मगरूर है।

संगदिल परदा-नशीं से,क्या करू उम्मीद--रहम,
वो तो अपने हुस्न के,जलवों में ही कुछ चूर है

सोज़--दिल रह रह के मुझसे,कर रहा है इल्तेजा,
कब्र में सो जाने दे,वहां चैन भी भरपूर है

खिज़ा आते ही ज्यूँ खुशबू,छोड़ देती है चमन,
मन भरे पे छोड़ देना,हुस्न का भी दस्तूर है

इश्क हूँ मैं तेरी नज़र से,कैसे करू मुकाबला,
मैं हूँ गर्त--गम--अँधेरा,तू चमकता नूर है

2 comments:

  1. it was good, but
    was not TOOOOOOOOOOOO good...

    I hope u know it...

    Shayad lambee zyada hone ki wajeh se aisaa laga...

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