Saturday, October 4, 2008

हाल


शाख से टूटा हुआ ख़ुद से कुछ रूठा हुआ,
मैं नज़र का ख्वाब हूँ इक,हूँ मगर टूटा हुआ

देखते हैं लोग मुझको देख कर अनजान हैं,
मैं मुसाफिर ही हूँ लोगो वक्त से छूटा हुआ

मेरे हाथों की लकीरें यूँ भी थी दुश्मन मेरी,
मेरी किस्मत की तरह अब चैन--दिल रूठा हुआ।

एक अरसे से खिलाफत में जिए हम दर्द की,
मेरे हिस्से वो ही आया हर गुमान झूठा हुआ

1 comment:

  1. Hi Aditya,

    Commas etc ka dhyaan rakha karo...

    like in this line
    मैं नज़र का ख्वाब हूँ इक हूँ मगर टूटा हुआ।
    should be

    मैं नज़र का ख्वाब हूँ इक, हूँ मगर टूटा हुआ।

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