Wednesday, October 15, 2008

हुस्न-ओ-इश्क


हुस्न कभी देता नहीं इजाज़त,इश्क को सजाने की,
मर मर के जिया करते हैं वो,जो इश्क किया करते हैं

गम--तन्हाई को सहने का तरीका देखो,
लहू अश्कों से बहा के,उफ़ तक ना किया करते हैं।


आसुओं से धुलके देखो,कैसा निखरा है दिल मेरा,
खून से लिपटा है और हम,बे-खौफ जिया करते हैं

उनसे कह दो दे दें हमको,दर्द--गम जितना भी है,
ये इश्क के नजराने हम हंस हंस के लिया करते हैं

क्यूँ परेशां इस कदर हैं वो,इश्क की रुसवाई से,
रुस्वाइयाँ आशिक तो यूँ,हर रोज़ पिया करते हैं

1 comment:

  1. Bahut khoob Aditya bhai !!

    Very well written...

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