Thursday, October 9, 2008

माँ . . .

माँ से पहले माँ के आगे ना जहाँ कोई और है,
दो जहाँ मिलते हैं जिसके कदमो में माँ ही तो है

माँ के आँचल में पनाहें पाती है हर इक खुशी,
मात को भी शय बनाती है जो वो माँ ही तो है

आँखें जब भी नम हुई जब भी गम ने तंग किया,
मेरे अश्कों को मोती बनाती है जो वो माँ ही तो है

लडखडाया जब कभी भी देखकर दुनिया को मैं,
हाथ थामे साथ चलती है जो वो माँ ही तो है

रौशनी संग संग रहे हर राह में बस इसलिए,
लम्हा लम्हा ख़ुद को जलाती है जो वो माँ ही तो है

भूख सहकर जो लहू को कर रही थी दूध सा,
मेरे लिए ख़ुद को मिटाती जो रही माँ ही तो है.

3 comments:

  1. सुन्दर भावपूर्ण रचना है।बधाई।

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  2. adi last 2 lines very nice,
    as usual rocking n very touching,
    Keep it going,
    ur dost V_V.

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