Sunday, October 5, 2008

रात दिन में ढल रहा हूँ



रात दिन में ढल रहा हूँ आग सा मैं जल रहा हूँ,
जैसे पलता है ज़ख्म कोई,दिल में अपने पल रहा हूँ

भागता हूँ अपने माज़ी से मैं,या गफलत में हूँ,
क्यूँ मैं अपने दिल को ऐसे,अपने दिल से छल रहा हूँ

क्यूँ मेरी ये जिंदगी अब, रही जो पहले थी,
क्यूँ नहीं जी पाऊ वैसे,जीता जैसे कल रहा हूँ

जब मैं तेरे पास था तब,थी चमक मुझ में सनम,
जब से तुझसे दूर हूँ,बे-नूर मैं हर पल रहा हूँ

हर पल जिया हर दम मरा,हर लम्हा तेरी याद में,
हुई ना थी जब ये मोहब्बत,यूँ ना मैं बेकल रहा हूँ

1 comment: