Saturday, August 9, 2008

ज़रा सोचो ...


जब पाप बढ़ा जब धर्म लुटा जब भूमि पर संहार हुआ,
तब तब नानक गौतम का,और राघव का अवतार हुआ.

वो दौर भी था जब कान्हा ने बंसी से प्रेम लुटाया था,
पर जब पाप किए थे कंस ने तब अस्त्रों से संहार हुआ.

जब जब अँधियारा छाया जब जब रुख पलटा हवाओ ने,
तब तब दीपक की ज्योति सा मानव ने प्रतिकार किया.

आकाश भी रोता है अब तो गहरे हैं ज़ख्म ये धरती के,
तुम ही क्यूँ अब तक सोये हो जिसका इन पर विस्तार हुआ.

अब तो जागो हुंकार भरो और कह दो उन तूफानों से,
जब जब उठते हैं हम तब तब हर साहिल का उद्धार हुआ.

है राज तो पर अब राम नही नीति भी अब साबुत न रही,
क्यूँ अर्थ के पीछे धर्म का यू हम लोगो से अपकार हुआ.

है लोग वो कुछ जो दुश्मन है मानव और मानवता के,
क्यूँ धारा-पुत्र अपने ही प्रति ख़ुद इस हद तक बेजार हुआ.

3 comments:

  1. Really awesome !!

    Padh kar lagta hai, ke tumne khoob mehnat kee hogi is par...

    bas ek line thori odd one out lagi mere ko is mein

    Kyun ab tak tum chup baithe ho kya lahu abhi na garm hua.

    garm ki jagah agar koi aur word fit kar sako to, because it doesn't matches with the rest of the poem...


    Overall it is TOOOO GOOOD !!

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