Tuesday, August 26, 2008

गम-ए-मोहब्बत...

रिन्द को तोहमत न दो यु लड़खडाने की यहाँ,
ये गुनाह उसका नहीं है ये कसूर-ए-जाम है.
मौत से ही अब जुडी है हर दुआ इसकी खुदा,
वजह शायद इसका उनसे इश्क वो नाकाम है.

हासिल-ए-गम-ए-मोहब्बत चंद साँसे ही रही,
कब्र मैं ही हो बसर अब ये तमन्ना आम है.
सबको मिलते चाँद-तारे देख मैं हैरान हु,
मेरे हिस्से है अँधेरा वो भी कुछ बदनाम है.

बेवफाई की ये तोहमत उनको देकर क्या करें,
दिल को तो पहले पता था जो अब मेरा अंजाम है.
उनकी नजरो मैं मिली न गर पनाहें गम नहीं,
अब जनाज़े पे हू निकला कुछ यहाँ आराम है.

3 comments:

  1. Aditya,
    Thori complex lagi mere ko...
    Baaki isko fursat mein padhoonga...
    fir comment daaloonga poem ke baare mein..

    Abhi ke liye sirf itna khoonga, try posting in Hindi rather than using English alphabets...it will be an easy read....what say?

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  2. ye hui na baat...
    Bahut badia poem hai...

    koi kami nahin ka koi chance nahi...

    Bas apni hindi mein thori spelling mistakes hain, unka khayal rakha karo...type karte waqt....

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  3. The best line I liked in your poem is

    वजह शायद इसका उनसे इश्क वो नाकाम है.

    Bahut khoob Aditya bhai !!

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