Friday, August 29, 2008

मोहताज...

मेरे हर्फ की जागीर तेरे नाम की मोहताज है,
कुछ कमी बिन तेरे है जो फिर छलकती आज है.
रूह का हासिल तसव्वुर इक तेरा ही है सनम,
बात कुछ है दिल मैं मेरे अब तलक जो राज है.

है बड़ी नासाज तबियत जो रूबरू तू आज है,
पंख सारे जल गए जैसे खो गयी परवाज है.
मेरी मजबूरी रही थी जान की दुश्मन मेरी,
बस तेरा ही साथ अब मेरे मर्ज़ का इलाज है.

तेरे बिन राग है ज़िन्दगी मेरी साज है,
तेरे बिन ख्वाहिश भी मेरी लगती अब बे-आवाज है.
है हुकूमत तेरी दिल पे ये मैं बयां कैसे करूँ,
अब तू ही मंजिल है मेरी और तू ही हमराज़ है.

8 comments:

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  2. ye hui na baat....

    Chhaa gaye guru !!

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  3. सादर अभिवादन ,
    सबसे पहले तो हिन्दी ब्लॉग के नए साथियों में आपका स्वागत है
    दूसरे आपकी इस सशक्त रचना के लिए बहुत बधाई

    चली अपने व् ब्लॉग के परिचय के लिए ,
    ब्लॉग पे डाली एक ताजे ग़ज़ल ये शेर भेज रहा हूँ
    देखियेगा -
    किसी तूफ़ान का जिनके जहन में डर नहीं होता
    हवाओं का असर ऐसे चिरागों पर नहीं होता

    समय रहते सियासत की शरारत जान ली वरना
    किसी का धड नहीं होता किसी का सर नहीं होता

    अगर जी - जान से कोशिश करोगे तो मिलेगी ये
    सफलता के लिए ताबीज़ या मंतर नहीं होता

    किसी की बात को कोई यहाँ तब तक नहीं सुनता
    किसी के हाथ में जब तक बड़ा पत्थर नहीं होता

    आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में
    डॉ उदय 'मणि' कौशिक

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  4. बहुत उम्दा ख्यालात ज़ाहिर किए हैं आपने इन लाइनों में
    आपसे गुजारिश है मेरे ब्लॉग पर भी दस्तक दें
    http:/manoria.blogspot.com and kanjiswami.blog.co.in
    आपको मेरी ग़ज़लों का भी दीदार हो सकेगा

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  5. नए चिट्टे की बहुत बहुत बधाई, निरंतर सक्रिय लेखन से हिन्दी ब्लॉग्गिंग को समृद्ध करते रहें.

    आपका मित्र
    सजीव सारथी
    आवाज़

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  6. बहुत ही खूबसूरत.

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